Tuesday, January 7, 2014

क्या कसूर /कविता

क्या कसूर /कविता
ग़मों के दौर है ,
मेरा क्या कसूर ,
हालात के सताए ,
हो गए मज़बूर।
छांव की आस  ,
 धुप में बहुत तपे  हजूर ,
बदकिस्मती हमारी क्या। …?
आदमी की साजिश ,
 कांटे मिले भरपूर .
विषबाण का सफ़र ,
मान बैठा दस्तूर।
आंसूओ का पलकों से खेलना ,
तकदीर बन गया है हजूर।
टूटे हुए ख्वाब ,
उम्मीद पर ज़िंदा हूँ
कोई  कहे मज़बूर ,
कोई  कहे बेक़सूर
हाय रे अपनी जहां
दमन,भेदभाव,उत्पीड़न
कैसा दस्तूर ....?
श्रमवीर -कर्मवीर मैं पर ,
अपनी जहां के दिए
गमो के दौर है,
मेरा क्या कसूर ..........
डॉ नन्द लाल भारती
आज़ाद दीप -15  एम -वीणा नगर
इंदौर (मध्य प्रदेश)452010
email- nlbharatiauthor@gmail.com
मोबाईल -09753081066


दीन /कविता
(शोषित मज़दूरो के लिए )
 किस्मत को क्यों ,दोष दे रहा ज़माना ,
याद नहीं जमाने को हक़ हजम कर जाना।
साजिशो की हिस्सा है मेरी मक्बूरियां ,
पी लेता हूँ ये विष ,कस लेता हूँ तन्हाईयाँ।
रार नहीं ठानता मैं ,खैरात चाहता ही नहीं ,
हाड को निचोड़कर दम भर लेता हूँ तभी।
हाड खुद का निचोड़ना आता नहीं ,
सच तब ये दुनिया वाले जीने देते नहीं।
सरेआम सौदा होता जहां चाहते बेचते वही
खुदा  का शुक्र है मज़दूर होकर रह गए ,
खुद ना बिके  श्रम बेचकर जी गए।
जमाने से रंज नहीं तो फक्र कैसा ,
जमाने की चकाचौंध में जी  लेता हूँ ,
दीन होकर भी दीन दयाल जैसा।
हसरतों के दामन घाव मिले
मैं कसूरवार नहीं ,
हमने लहू को  पानी बनाकर सींचा
कर्म की क्यारी क्यारी ,छल मिले ,
प्रतिफल की जगह ,
मुझे हकदार दम्भियों ने माना ही नहीं।
डॉ नन्द लाल भारती
आज़ाद दीप -15  एम -वीणा नगर
इंदौर (मध्य प्रदेश)452010
email- nlbharatiauthor@gmail.com
मोबाईल -09753081066






चुभन/कविता
मेरी तकदीर का सुमन,
ना खिला ,
कर्म के दामन घाव,
 मिला,
ये तुमने क्या कर दिया ,
भरी महफ़िल में एक और,
नया घाव  दे दिया।
हम इतने बदनाम,
ना थे कभी
पसीने से प्यास बुझाने की
आदत है मेरी ,
आज भी कायम हूँ ,
सीने में है घाव ,
दी हुई तेरी।
मैं घाव के बदले घाव,
नहीं देता ,
नफ़रत बोना मुझे
आता नहीं ,
चला था सुमन की आस में
अब तो ,
चुभन में भी मुस्करा लेता .............
डॉ नन्द लाल भारती
आज़ाद दीप -15  एम -वीणा नगर
इंदौर (मध्य प्रदेश)452010
email- nlbharatiauthor@gmail.com
मोबाईल -09753081066




वेदना के फूल/कविता
वेदना के फूल ,
श्रध्दा की थाली में भर लाया हूँ।
संवेदना  गंगाजल,
पलकों पर उतार लाया हूँ .
कल की आशा में,
 चोट बहुत खाया हूँ .
 संवर जाए कल ,
ऐसा गुण खोजने आया हूँ ,
सुख की आशा में ,
छलकते आंसू पाया हूँ।
ठगा गया जीवन ,
शांति के द्वार आया हूँ।
 ना  रिसे  घाव अब ,
ऐसा मरहम खोजने आया हूँ ,
लोग खींचे -खींचे ,
मैं सद्भावना का भाव ,
खोजने आया हूँ।
ना जाति धर्म का विष बोने ,
मैं  तो मानवता की,
बात करने आया हूँ.
पलकें नाम दिल रोता ,
जख्म गहरा पाया हूँ.
तकदीर कैद ,
मैं तो फ़रियाद करने आया हूँ।
लकीरो ने किया फ़कीर ,
मैं तो एकता का,
सन्देश लाया हूँ।
फले-फुले कायनात ,
मैं तो तरक्की का,
वरदान लेने आया हूँ .
वेदना की फूल ,
श्रध्दा की थाली में भर लाया हूँ।
डॉ नन्द लाल भारती
आज़ाद दीप -15  एम -वीणा नगर
इंदौर (मध्य प्रदेश)452010
email- nlbharatiauthor@gmail.com
मोबाईल -09753081066



लोक मैत्री/कविता
लोकमैत्री की बहारे,
बीती का री रातें
विहसा जन-जन
 छाई जग में उजियारी ,
नया सबेरा नई उमंगें
जीवित मन के प्रपात ,
फ़ैलने लगा अब ,
लोकमैत्री का प्रकाश।
सद्भावना का उदय ,
मन हुआ चेतन ,
जाति धर्म की बात नहीं ,
जग सारा हुआ निकेतन।
मान्य नहीं
जाति धर्म का समर ,
जय गान सद्भावना
विहास उठेगा जीवन सफ़र।
विश्व्बंधुतव की राह ,
नही होगा अब मन खिन्न ,
ना होगा भेदभाव
ना होगा आदमी भिन्न।
लोकमैत्री का भाव,
विश्व एकता जोड़ेगा ,
ना गैर ना बैर हर स्वर
सद्भावना की जय बोलेगा।
डॉ नन्द लाल भारती
आज़ाद दीप -15  एम -वीणा नगर
इंदौर (मध्य प्रदेश)452010
email- nlbharatiauthor@gmail.com
मोबाईल -09753081066

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